90 प्रतिशत फसल बर्बाद, किसान बर्बादी की कगार पर
लांबाहरिसिंह (सच्चा सागर)। 31 मार्च की शाम लांबाहरिसिंह क्षेत्र के किसानों के लिए किसी काली रात से कम नहीं थी। झाड़ली, किशनपुरा, सूरजपुरा, अरणिया सहित दर्जनों गांवों में अचानक बदले मौसम ने ऐसा कहर बरपाया कि खेतों में लहलहाती फसल कुछ ही पलों में बर्बादी के मंजर में बदल गई। तेज आंधी, मूसलाधार बारिश और बेर के आकार के ओलों ने चना, सरसों और गेहूं की फसल को जमीन पर गिराकर पूरी तरह चौपट कर दिया। खेतों में जहां कुछ देर पहले सुनहरी फसल लहरा रही थी, वहीं अब सिर्फ बिखरी हुई बालियां, गिरे हुए पौधे और पानी में डूबी मेहनत दिखाई दे रही है। किसानों के सपनों को मानो आसमान से गिरी इस आफत ने कुचल कर रख दिया।
‘70 नहीं, 90 प्रतिशत फसल तबाह’ किसानों का फूटा गुस्सा
झाड़ली के प्रशासक सत्यनारायण बलाई ने बताया कि प्रशासन द्वारा ओलावृष्टि में हुए नुकसान का 70 प्रतिशत बताया गया है जबकि 90 प्रतिशत फसल नष्ट होकर खेतों में ही रह गई है। किसानों ने बताया कि गत वर्ष भी अत्यधिक बारिश के चलते मूंग मक्का बाजार की $फसल भी नष्ट हो गई थी। किसानों ने किसान क्रेडिट कार्ड एवं सेठ साहूकारो से ऋण लेकर बीजारोपण किया, लेकिन उस समय भी सम्पूर्ण फसल गलकर नष्ट हो गई साथ ही जानवरों के चारे का संकट भी हुआ। ओलों की मार से गिरी फसल अब उठाने लायक भी नहीं बची। खेतों में पड़ा चना मिट्टी में मिल चुका है और सरसों-गेहूं की बालियां झुककर सडऩे लगी हैं।
कर्ज और सिर्फ कर्ज—किसान टूट चुका है
किसानों की हालत सिर्फ फसल तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक रूप से भी वे पूरी तरह टूट चुके हैं। किसान लाला राम माली बताते हैं। 10 बीघा चना कटा पड़ा था, ओले और हवा उसे उड़ाकर ले गए, दाना जमीन में बिखर गया। अब कुछ नहीं बचा। रिधकरण धोबी, हंसराज बैरवा और छीतर लाल शर्मा जैसे कई किसानों की कहानी भी यही है। किसी ने 5 बीघा खोया, किसी ने 80 बीघा, तो किसी ने लाखों का कर्ज लेकर खेती की। और अब सब कुछ मिट्टी में मिल गया। छीतर लाल शर्मा की पीड़ा और भी गहरी है। ‘दो लाख रुपये उधार लिए थे, फसल से चुकाने थे। अब फसल ही नहीं बची, कर्ज कैसे चुकाएं?’
पशुधन को भी नुकसान, जनजीवन अस्त-व्यस्त
ओलावृष्टि ने सिर्फ फसल ही नहीं, बल्कि पशुधन को भी भारी नुकसान पहुंचाया। झाड़ली में सुंदराम गुर्जर की चार भेड़ें और राजू की तीन बकरियां ओलों की चपेट में आकर मर गईं। तेज हवा से टीन शेड उड़ गए, पेड़ जड़ से उखड़ गए। खेत में काम कर रही प्रियंका बेरवा और नीर देवी अचानक आई इस आपदा में बेहोश होकर गिर पड़ीं, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
‘ऐसी तबाही कभी नहीं देखी’, 70 वर्षीय किसान का दर्द
70 वर्षीय किसान जगन्नाथ बेरवा की आंखों में आंसू हैं, ‘जिंदगी भर खेती की, लेकिन ऐसी ओलावृष्टि कभी नहीं देखी... सब कुछ खत्म हो गया।’
अब मुआवजा ही आखिरी उम्मीद
लगातार दूसरे साल फसल खराब होने से किसानों के सामने अब जीवन यापन का संकट खड़ा हो गया है। किसान क्रेडिट कार्ड, साहूकारों का कर्ज, और अब फसल बर्बादी—तीनों ने मिलकर किसानों को कंगाली की कगार पर ला खड़ा किया है। किसानों ने प्रशासन से गुहार लगाई है कि जल्द से जल्द सर्वे कराकर उचित मुआवजा दिया जाए, वरना हालात इतने बिगड़ सकते हैं कि उन्हें अपनी जमीन बेचने तक की नौबत आ जाएगी।
