(सच्चा सागर )आवां दड़े का पैगाम: सामान्य रहेगा नया साल इस साल न अकाल पड़ेगा और न सुकाल होगा, इस बार सवा दो घंटे ग्रामीणों ने की जोर आजमाइश, महिलाओं ने की छतों से की हूटिंग

 आवां दड़े का पैगाम: सामान्य रहेगा नया साल

 इस साल न अकाल पड़ेगा और न सुकाल होगा, इस बार सवा दो घंटे ग्रामीणों ने की जोर आजमाइश, महिलाओं ने की छतों से की हूटिंग







(सच्चा सागर )इस बार भी मकर संक्रांति पर्व पर आवां कस्बे में खेला गया दड़ा गढ़ में चला गया। ऐसे में यह साल सामान्य रहेगा। न अकाल पड़ेगा और न सुकाल होगा। प्रदेश में अकाल-सुकाल की भविष्यवाणी सी करने वाला यह दड़ा महोत्सव इस बार लोगों की उम्मीदों पर आशानुरूप खरा नहीं उतरा। लोगों को उम्मीद थी कि इस बार दड़ा पैगाम खुशहाली का पैगाम लेकर आएगा, लेकिन इसने सामान्य साल रहने का संकेत दिया है। 

 प्रदेश की कृषि दशा और समृद्धि की भविष्यवाणी करने वाला यह ऐतिहासिक दड़ा महोत्सव बुधवार को पूरे उत्साह और रोमांच के साथ खेला गया। बारह गांवों समेत अन्य जगह से आए हजारों ग्रामीण गढ़ के चौक में दड़े को दोपहर सवा बारह बजे रखते ही टूट पड़े। करीब सवा दो घंटे की जोर आजमाइश के बाद दोपहर ढाई बजे इस साल दड़ा गढ़ में गया। इससे न तो इस साल अकाल पड़ेगा और ना सुकाल होगा। यह साल सामान्य रहेगा।

करीब 80 किलो वजनी टाट (जुट)से बने दड़े की पूजा बुधवार को मकर संक्रांति के दिन दोपहर सवा 12 बजे गढ़ पैलेस में की गई। पूर्व मंत्री प्रभुलाल सैनी, राजपरिवार के आदित्य सिंह व कार्तिकेय सिंह, प्रदेश कांग्रेस के पूर्व सचिव कुलदीप सिंह राजावत और पंचायत प्रशासक (सरपंच) दिव्यांश एम. भारद्वाज ने विधिवत पूजा-अर्चना कर भगवान से प्रार्थना की । इस। दौरान सभी ने दड़ा खुशहाली के प्रतीक दूनी दरवाजे में जाए, ताकि प्रदेश में सुकाल हो और किसान खुशहाल हो।


कइयों के कपड़े फटे, 

दोपहर 12:15 बजे जैसे ही दड़ा गोपाल जी भगवान के चौक में रखा गया तो तो लोग खेलने के लिए उमड़ पड़े। जमकर धक्का-मुक्क हुई। कोई गिर रहा था, किसी की पगड़ी हवा में उड़ रही थी, तो किसी के कपड़े तार-तार हो रहे थे। सवा दो घंटे तक चले इस संघर्ष में दड़ा कभी अखनियां तो कभी दूनी गोल पोस्ट की ओर बढ़ता रहा। जब दड़ा दूनी गोल पोस्ट की दिशा में सरकने लगा, तो किसानों के चेहरों पर खुशी दिखी, लेकिन कुछ ही देर में वह गौपाल चौक में ही इधर उधर खिसकता रहा। आखिरकार तमाम कोशिशों के बावजूद दड़ा खेल समाप्ति आधा घंटा पहले दोपहर करीब ढाई बजे दड़ा वापस गढ़ में चला गया।

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