रामबिलास लांगड़ी ( प्रबंध सम्पादक दैनिक सच्चा सागर टोंक)
इतिहास गवाह है साम्राज्य तलवारों से नहीं, साहस, संकल्प और रणनीति से कायम होते हैं। महाराणा प्रताप की जिजीविषा हो, छत्रपति शिवाजी महाराज की गनिमी कावा नीति हो या स्वतंत्रता सेनानियों का अदम्य हौसला हर दौर ने यही सिखाया है कि दुश्मन की ताकत से अधिक महत्वपूर्ण अपने इरादों की धार होती है।टोंक की धरती पर आज इसी जज़्बे की एक आधुनिक मिसाल दिखाई देती है टोंक पुलिस अधीक्षक रोशन मीणा की डीएसटी टीम इसके प्रभारी है ओमप्रकाश चोधरी यह कोई साधारण पुलिस टीम नहीं, बल्कि अपराध के अंधेरे में जलती हुई वह मशाल है, जिसकी रोशनी पड़ते ही कई चेहरों से नकाब उतरने लगते हैं। जहां आम आदमी को किसी संदिग्ध की भनक मिलती है, वहां DST उसकी तह तक पहुंचने की कोशिश करती है। अपराधी चाहे कितना भी चालाकी का लबादा ओढ़ ले, कानून की निगाह से बचना आसान नहीं।कहावत है-सौ सुनार की, एक लोहार की।टोंक DST की कार्रवाई देखकर यह कहावत चरितार्थ होती दिखाई देती है।अपराध की दुनिया में कुछ लोग अपने आपको शेर समझने की भूल कर बैठते हैं। मूंछों पर ताव, आंखों में गुरूर और जुबान पर दबंगई लेकिन जब कानून की दस्तक होती है तो वही तथाकथित शेर कागजी बाघ साबित होने लगते हैं। कल तक जो गलियों में अकड़कर चलते थे,आज उन्हें कानून की चौखट तक पहुंचाने में DST की त्वरित कार्रवाई अहम भूमिका निभा रही है।खौफ उसका नहीं जो शोर मचाए, खौफ उसका है जिसके आने की खबर ही काफी हो।टोंक DST के लिए यह पंक्ति सटीक बैठती है।कहीं अवैध बजरी का खेल हो, कहीं साइबर ठगी का जाल, कहीं मादक पदार्थों का कारोबार या फिर किसी संगीन अपराध की परछाईं DST की सक्रियता अपराधियों के लिए वह अलार्म बन चुकी है, जिसकी आवाज सुनते ही उनकी कथित बादशाहत की सल्तनत में खलबली मच जाती है।उर्दू में एक खूबसूरत शब्द है दहशत, लेकिन कानून के लिए दहशत पैदा करना उद्देश्य नहीं, उद्देश्य है कानून का इकबाल कायम करना।और यही फर्क एक जिम्मेदार पुलिस कार्रवाई और महज शक्ति प्रदर्शन के बीच रेखा खींचता है।टोंक DST की असली उपलब्धि केवल गिरफ्तारी या बरामदगी नहीं है। असली उपलब्धि यह है कि अपराध करने वाले को यह एहसास हो कि कानून सोया नहीं है।अपराधी कितना भी मक्कार, शातिर, शह-मात का खिलाड़ी या गली-मोहल्ले का स्वयंभू बाहुबली क्यों न हो कानून की बिसात पर आखिरकार उसकी चाल सीमित ही रहती है।और DST?वह उस खिलाड़ी की तरह है जो चाल चलने से पहले पूरी बिसात पढ़ लेता है।रणभूमि में वही विजेता कहलाता है,जिसकी भुजाओं से पहले उसका मनोबल गरजता है।टोंक DST के जवानों की सजगता इसी मनोबल की तस्वीर है। रात का अंधेरा हो या दिन का उजाला, सूचना कितनी भी पेचीदा हो या अपराधी कितना भी छद्मवेशी यदि टीम ने ठान लिया, तो सुराग की एक पतली-सी डोर भी मंजिल तक पहुंचने का रास्ता बन सकती है।कबीर ने कहा था काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।पुलिसिंग में इस दोहे की सबसे बड़ी व्यावहारिक व्याख्या है—त्वरित कार्रवाई यही त्वरितता DST की पहचान बन रही है आज आवश्यकता है कि टोंक जिले की प्रत्येक पुलिस टीम इसी ऊर्जा, समन्वय और कर्तव्यनिष्ठा को अपनी कार्यशैली का हिस्सा बनाए। क्योंकि जब थाना पुलिस और DST एक-दूसरे की ताकत बनकर काम करते हैं,तब अपराधियों के लिए बच निकलने की राह और संकरी हो जाती है।टोंक DST के जवानों के नाम बस इतना आपकी वर्दी केवल कपड़ा नहीं, जनविश्वास की जिम्मेदारी है। आपकी कार्रवाई केवल एक केस का निस्तारण नहीं, बल्कि समाज में यह संदेश है कि कानून की आंख खुली है।अपराधी चाहे जितना उस्ताद बनने की कोशिश करे, कानून की किताब में उसकी कहानी का आखिरी अध्याय हमेशा उसके मुताबिक नहीं लिखा जाता।इसलिए चलते रहिए निडर होकर, निष्पक्ष होकर, निर्भीक होकर।क्योंकि जहां अपराधी अपनी चाल पर इतराता है,वहीं DST उसकी अगली चाल पढ़ने में जुटी होती है।और टोंक की जनता की उम्मीद बस इतनी है खाकी का इकबाल बुलंद रहे,कानून का परचम ऊंचा रहे,और अपराध की हर काली परछाईं के सामने टोंक पुलिस का हौसला हिमालय की तरह अडिग रहे।सलाम उस जज्बे को,सलाम उस कर्तव्यनिष्ठा को,और सलाम टोंक DST की उस टीम भावना को जो अपराध के अंधेरे में कानून की मशाल लेकर आगे बढ़ रही है।
यह मूवी नहीं, रियल कहानी है साहब... टोंक DST का नाम आते ही अच्छे-अच्छे ‘पुष्पा’ झुकते भी हैं और सलाम भी ठोकते हैं!
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