नोहटा की चिरमी डूंगरी में ‘खनन लीला’!



वन चौकी बनी चौपाल, अवैध खनन माफियाओं की निकल रही बल्ले-बल्ले, वन विभाग बेबस

निवाई (सच्चा सागर)। उपखण्ड क्षेत्र की नोहटा चौकी इन दिनों किसी वन सुरक्षा चौकी से कम और खनन माफियाओं के वीआईपी लाउंज से ज्यादा नजर आने लगी है। ग्रामीणों का आरोप है कि सिरस नाका के अधीनस्थ नोहटा चौकी में तैनात कार्मिक कमलेश और गार्ड ओमप्रकाश की कथित मेहरबानी से नोहटा चौकी वन चौकी के सामने चिरमी डूंगरी का सीना मशीनों से छलनी किया जा रहा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि जंगल में अब शेर कम और जेसीबी के पंजों की दहाड़ ज्यादा सुनाई देती है। ग्रामीणों का आरोप है कि कमलेश मीणा ने अपने मौसेरे भाई मुकेश पर ऐसी कृपा बरसाई हुई है कि मानो डूंगरी कोई सरकारी वन क्षेत्र नहीं बल्कि खानदानी जागीर हो। आरोप है कि दिन-रात कीमती पत्थरों का अवैध खनन खुलेआम चल रहा है और वन विभाग की चौकी सब कुछ देखकर भी ‘अंधा-गूंगा-बहरा’ बनी हुई है। स्थनीय ग्रामीणों का कहना है कि अगर वन विभाग की इसी रफ्तार से सेवा चलती रही तो आने वाले समय में जंगल की जगह बोर्ड लगाना पड़ेगा यहां कभी पहाड़ हुआ करता था।  

मशीनों की गरज से कांप रही डूंगरी, जंगल में कानून नहीं, जेसीबी का राज!

स्थानीय लोगों के अनुसार चिरमी डूंगरी में बड़े पैमाने पर मशीनों का उपयोग कर अवैध खनन किया जा रहा है। पहाड़ी को इस तरह काटा जा रहा है जैसे कोई हलवाई मिठाई काट रहा हो। ग्रामीणों का आरोप है कि माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें न वन विभाग का डर है और न प्रशासन का। ग्रामीणों ने बताया कि खनन शुरू होने से पहले पूरे इलाके में रैकी गैंग सक्रिय हो जाता है। काली स्कॉर्पियो गाडिय़ां इलाके में ऐसे घूमती नजर आती हैं जैसे किसी फिल्म की शूटिंग चल रही हो। इनका काम कथित तौर पर वन विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की गतिविधियों पर नजर रखना बताया जा रहा है। जैसे ही किसी निरीक्षण या शिकायत की भनक लगती है, वैसे ही माफिया अलर्ट मोड पर आ जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि ऊपर से सूचना पहले ही लीक हो जाती है और खनन करने वाले मशीनें समेटकर ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि निरीक्षण भी सिर्फ फोटो खिंचवाने और खानापूर्ति तक सीमित रह गया है। अधिकारी आते हैं, इधर-उधर देखते हैं, दो-चार लोगों से बात करते हैं और फिर सब कंट्रोल में है कहकर रवाना हो जाते हैं। पीछे से फिर वही पुराना खेल शुरू हो जाता है। 

शिकायत करो तो धमकी फ्री! ग्रामीण बोले खनन माफिया नहीं, चलता-फिरता आतंक 

ग्रामीणों का आरोप है कि जब भी कोई व्यक्ति अवैध खनन की शिकायत करता है तो उसे डराया-धमकाया जाता है। कई ग्रामीणों ने दावा किया कि उन्हें जान से मारने और मारपीट तक की धमकियां दी गई हैं। लोगों का कहना है कि इलाके में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि शिकायतकर्ता खुद को अपराधी समझने लगे हैं और खनन करने वाले माननीय की तरह घूम रहे हैं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि चौकी पर तैनात कुछ कार्मिक कथित रूप से माफियाओं से मोटी रकम वसूल रहे हैं। यही वजह है कि कार्रवाई के नाम पर सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए जाते हैं। एक ग्रामीण ने गुस्से में कहा कि यहां जंगल बचाने वाले ही जंगल बेचने में लगे हैं। अगर यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ी बच्चों को पेड़ किताबों में दिखाएगी। ग्रामीणों का कहना है कि चिरमी डूंगरी का पर्यावरण तेजी से बिगड़ रहा है। अवैध खनन के कारण पहाडिय़ों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। धूल-मिट्टी और मशीनों के शोर से वन्यजीव भी प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन जिम्मेदार विभाग मानो गहरी नींद में सोया हुआ है। 

 वन विभाग या खनन विभाग ? ग्रामीणों ने उठाए बड़े सवाल

अब ग्रामीणों ने वन विभाग के उच्चाधिकारियों की कार्यशैली पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। लोगों का आरोप है कि शिकायतों को गंभीरता से लेने के बजाय फाइलों में दबा दिया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो चिरमी डूंगरी पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी। लोगों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए और अवैध खनन पर तत्काल रोक लगाई जाए। इलाके में चर्चा यह भी है कि नोहटा चौकी अब वन सुरक्षा से ज्यादा खनन सुरक्षा का केंद्र बन चुकी है। ग्रामीण तंज कसते हुए कहते हैं कि यहां पेड़ों की नहीं, पत्थरों की सुरक्षा हो रही है... वो भी सीधे माफियाओं की जेब तक पहुंचाने के लिए! अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस पूरे मामले को गंभीरता से लेकर कोई ठोस कदम उठाता है या फिर चिरमी डूंगरी की किस्मत यूं ही मशीनों के पंजों में पिसती रहेगी।   

 

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