मालपुरा (सच्चा सागर)। उपखंड क्षेत्र के डूंगरी कला और फूल मालियान गांव आज उस दर्दनाक हकीकत के प्रतीक बन चुके हैं, जहां विकास और रोजगार के नाम पर ग्रामीणों की जिंदगी को दांव पर लगाया जा रहा है। आबादी क्षेत्र के नजदीक माइंसों और थ्रेसरों के संचालन की अनुमति ने गांवों का वातावरण जहरीला बना दिया है। दिन-रात उड़ती धूल, मशीनों का कान फोड़ शोर और भारी वाहनों की आवाजाही ने ग्रामीणों का जीना दूभर कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रशासन और संबंधित विभाग किस आधार पर आबादी क्षेत्र के पास ऐसे खतरनाक संचालन की अनुमति दे देते हैं? क्या ग्रामीणों का जीवन, स्वास्थ्य और भविष्य किसी भी कीमत पर मायने नहीं रखता? डूंगरी कला और फूल मालियान जैसे गांवों में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि घरों में बैठना तक मुश्किल हो गया है। सुबह होते ही हवा में उड़ती धूल लोगों की सांसों में जहर घोलने लगती है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायतें करने के बावजूद अधिकारियों ने केवल औपचारिकता निभाई, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। सवाल यह भी है कि क्या अनुमति देने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव और आबादी की सुरक्षा का आकलन किया जाता है या केवल कागजों में नियम पूरे कर दिए जाते हैं? सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन स्थानों पर माइंसों और थ्रेसरों का संचालन हो रहा है, वहां आबादी बेहद नजदीक हैं। भारी वाहन गांव की सडक़ों से गुजरते हैं, जिससे हर समय दुर्घटना का खतरा बना रहता है। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ प्रभावशाली लोगों और आर्थिक हितों के चलते नियमों की अनदेखी की जाती है। यदि यही स्थिति किसी शहर या बड़े अधिकारी के घर के पास होती, तो क्या वहां भी इतनी आसानी से अनुमति दी जाती? यह दोहरे मापदंड ग्रामीणों के मन में प्रशासन के प्रति गहरा आक्रोश पैदा कर रहे हैं। सरकारें अक्सर गांवों के विकास, स्वच्छ वातावरण और ग्रामीण स्वास्थ्य की बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। जिन लोगों को ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, वही विभाग आंखें मूंदे बैठे हैं। आखिर क्यों आबादी क्षेत्र से दूर ऐसे उद्योग स्थापित करने के नियमों का पालन नहीं करवाया जाता? क्यों पर्यावरण और मानव जीवन से खिलवाड़ करने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती? आज जरूरत केवल जांच या आश्वासन की नहीं, बल्कि कठोर निर्णय की है। आबादी क्षेत्र के पास संचालित माइंसों और थ्रेसरों को तुरंत हटाने, प्रदूषण नियंत्रण के नियमों की सख्ती से पालना करवाने और ग्रामीणों के स्वास्थ्य की जांच करवाने की आवश्यकता है। यदि समय रहते प्रशासन नहीं जागा, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या किसी बड़े स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट का रूप ले सकती है। विकास के नाम पर गांवों को बीमारी और भय की सौगात देना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।
मालपुरा (सच्चा सागर)। उपखंड क्षेत्र के डूंगरी कला और फूल मालियान गांव आज उस दर्दनाक हकीकत के प्रतीक बन चुके हैं, जहां विकास और रोजगार के नाम पर ग्रामीणों की जिंदगी को दांव पर लगाया जा रहा है। आबादी क्षेत्र के नजदीक माइंसों और थ्रेसरों के संचालन की अनुमति ने गांवों का वातावरण जहरीला बना दिया है। दिन-रात उड़ती धूल, मशीनों का कान फोड़ शोर और भारी वाहनों की आवाजाही ने ग्रामीणों का जीना दूभर कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रशासन और संबंधित विभाग किस आधार पर आबादी क्षेत्र के पास ऐसे खतरनाक संचालन की अनुमति दे देते हैं? क्या ग्रामीणों का जीवन, स्वास्थ्य और भविष्य किसी भी कीमत पर मायने नहीं रखता? डूंगरी कला और फूल मालियान जैसे गांवों में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि घरों में बैठना तक मुश्किल हो गया है। सुबह होते ही हवा में उड़ती धूल लोगों की सांसों में जहर घोलने लगती है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायतें करने के बावजूद अधिकारियों ने केवल औपचारिकता निभाई, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। सवाल यह भी है कि क्या अनुमति देने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव और आबादी की सुरक्षा का आकलन किया जाता है या केवल कागजों में नियम पूरे कर दिए जाते हैं? सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन स्थानों पर माइंसों और थ्रेसरों का संचालन हो रहा है, वहां आबादी बेहद नजदीक हैं। भारी वाहन गांव की सडक़ों से गुजरते हैं, जिससे हर समय दुर्घटना का खतरा बना रहता है। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ प्रभावशाली लोगों और आर्थिक हितों के चलते नियमों की अनदेखी की जाती है। यदि यही स्थिति किसी शहर या बड़े अधिकारी के घर के पास होती, तो क्या वहां भी इतनी आसानी से अनुमति दी जाती? यह दोहरे मापदंड ग्रामीणों के मन में प्रशासन के प्रति गहरा आक्रोश पैदा कर रहे हैं। सरकारें अक्सर गांवों के विकास, स्वच्छ वातावरण और ग्रामीण स्वास्थ्य की बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। जिन लोगों को ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, वही विभाग आंखें मूंदे बैठे हैं। आखिर क्यों आबादी क्षेत्र से दूर ऐसे उद्योग स्थापित करने के नियमों का पालन नहीं करवाया जाता? क्यों पर्यावरण और मानव जीवन से खिलवाड़ करने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती? आज जरूरत केवल जांच या आश्वासन की नहीं, बल्कि कठोर निर्णय की है। आबादी क्षेत्र के पास संचालित माइंसों और थ्रेसरों को तुरंत हटाने, प्रदूषण नियंत्रण के नियमों की सख्ती से पालना करवाने और ग्रामीणों के स्वास्थ्य की जांच करवाने की आवश्यकता है। यदि समय रहते प्रशासन नहीं जागा, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या किसी बड़े स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट का रूप ले सकती है। विकास के नाम पर गांवों को बीमारी और भय की सौगात देना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।
