आदेशों की गूंज बहुत हुई, धरातल पर कार्यवाही कब?


मालपुरा (सच्चा सागर)।
सरकारी भूमि पर बढ़ते अतिक्रमण अब केवल अवैध कब्जों का मामला नहीं रहे, बल्कि यह निष्क्रियता और व्यवस्था की कमजोर होती पकड़ का बड़ा उदाहरण बन चुके हैं। जनता लगातार शिकायतें कर रही है, अधिकारी आदेश पर आदेश जारी कर रहे हैं, लेकिन धरातल पर हालात में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता। सवाल यह है कि आखिर सरकारी जमीनों को कब्जामुक्त कराने की वास्तविक इच्छा शक्ति कब नजर आएगी? हर बार जब किसी सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायत उठती है तो प्रशासन सक्रिय होने का नाटक करता नजर आता है। कुछ जगहों पर जेसीबी पहुंचती है, फोटो खिंचते हैं, मीडिया में सुर्खियां बनती हैं और फिर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। बड़े कब्जाधारियों तक कार्रवाई पहुंचते-पहुंचते सिस्टम की हिम्मत जवाब दे देती है। छोटे लोगों पर कार्रवाई कर प्रशासन अपनी पीठ थपथपा लेता है, जबकि प्रभावशाली कब्जाधारी बेखौफ होकर सरकारी जमीनों पर साम्राज्य खड़ा करते रहते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रशासन को अतिक्रमण की पूरी जानकारी होती है, रिकॉर्ड उपलब्ध होते हैं, शिकायतें बार-बार दी जाती हैं, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या सरकारी भूमि केवल कागजों में बची रहेगी? क्या जनता की संपत्ति पर कब्जा करने वालों को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण मिलता रहेगा? यदि नहीं, तो फिर कठोर और स्थायी कार्रवाई दिखाई क्यों नहीं देती? आज हालत यह है कि सरकारी भूमि पर कब्जे सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि यह भ्रष्टाचार, मिलीभगत और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन चुके हैं। कहीं श्मशान की भूमि को निगल लिया गया है। कही तालाबी भूमि की निगला जा रहा है । लेकिन जिम्मेदार विभागों की चुप्पी यह संकेत देती है कि या तो वे असहाय हैं या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं। जरूरत केवल नोटिस जारी करने की नहीं, बल्कि निष्पक्ष और निरंतर कार्रवाई की है। प्रशासन को यह साबित करना होगा कि कानून केवल कमजोर लोगों के लिए नहीं है। यदि वास्तव में सरकारी भूमि को बचाने की मंशा है तो प्रभावशाली कब्जाधारियों पर भी समान रूप से कार्रवाई करनी होगी। वरना जनता के मन में यह धारणा और मजबूत होगी कि ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ सिर्फ दिखावे और सुर्खियां बटोरने का माध्यम बनकर रह गया है। अब समय आ गया है कि प्रशासन फाइलों और औपचारिक बैठकों से बाहर निकलकर जमीन पर सख्त कदम उठाए। क्योंकि यदि आज सरकारी भूमि नहीं बचाई गई, तो आने वाली पीढिय़ों के हिस्से में सिर्फ अवैध कब्जों का जंगल और प्रशासनिक विफलता की कहानियां ही बचेंगी।     


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